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DAY-59

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रागद्वेषवियुक्तैस्तु  विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा  प्रसादमधिगच्छति। ६४। प्रसादे  सर्वदुःखानां  हानिरस्योपजायते।  प्रसन्नचेतसो  ह्याशु  बुद्धिः  पर्यवतिष्ठते। ६५ । हिंदी अर्थ-परंतु अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला साधक अपने वश में की हुई राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है ॥६४-६५ ॥ English Meaning -  But a devotee with his conscience subdued, moving through objects with his senses devoid of attachment and aversion, attains inner contentment. With the inner contentment, all its sorrows vanish, and the mind of that happy Karmayogi quickly turns away from everything else and becomes firmly fixed on the one Supreme Soul. 64-65.

DAY-58

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ध्यायतो  विषयान्पुंसः  सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते  कामः  कामात्क्रोधोऽभिजायते। ६२। क्रोधाद्भवति  सम्मोहः  सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्  बुद्धिनाशो  बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । ६३ । हिंदी अर्थ:- विषयों का चिन्तन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है,  आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।  क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है,  स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और  बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ॥६२-६३ ॥ English Meaning:-A person who contemplates worldly pleasures becomes attached to them.  Attachment leads to desire for them, and when desire is obstructed, anger arises.  Anger leads to extreme stupidity, and stupidity leads to confusion in memory.  This confusion in memory destroys the intellect, i.e., the power of knowl...

DAY-57

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यततो   ह्यपि   कौन्तेय   पुरुषस्य   विपश्चितः।  इन्द्रियाणि   प्रमाथीनि   हरन्ति   प्रसभं   मनः । ६० ।  तानि   सर्वाणि   संयम्य   युक्त   आसीत   मत्परः।  वशे   हि   यस्येन्द्रियाणि   तस्य   प्रज्ञा   प्रतिष्ठिता। ६१।   हिंदी अर्थ:-हे अर्जुन ! आसक्ति का नाश न होने के  कारण ये प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए  बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं।  इसलिये साधक को चाहिये कि वह उन सम्पूर्ण  इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे  परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की  इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती  है ॥ ६०-६१ ॥ English Meaning:- O Arjuna! Because attachment is not  destroyed, these senses of the nature of  churning forcibly take away even the  mind of the intelligent man while ...

DAY-56

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य दा  संहरते  चायं  कूर्मोऽङ्गानीव  सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य  प्रज्ञा  प्रतिष्ठिता। ५८। विषया  विनिवर्तन्ते  निराहारस्य  देहिनः।  रसवर्णं  रसोऽप्यस्य  परं  दृष्ट्वा  निवर्तते । ५९। हिंदी अर्थ -और कछुवा सब ओरसे अपने अंगों को  जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के  विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब  उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिये)।  इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुष  के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें  रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ  पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार  करके निवृत्त हो जाती है ॥ ५८-५९ ॥ Just as a tortoise withdraws its limbs from  all sides, so too, when this man withdraws  his senses from their objects, his intellect  is stable (it should be understood thus).  Even for a man who does not perceive  sense objects, onl...

DAY-55

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  दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः  सुखेषु  विगतस्पृहः।  वीतरागभयक्रोधः   स्थितधीर्मुनिरुच्यते । ५६ ।  यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य   शुभाशुभम् ।  नाभिनन्दति  न  द्वेष्टि  तस्य  प्रज्ञा  प्रतिष्ठिता । ५७। हिंदी अर्थ -दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता,  सुखोंकी प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके  राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि  स्थिरबुद्धि कहा जाता है।  जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या  अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न  द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है ॥ ५६-५७ ॥ English meaning-A sage whose mind is  unperturbed by suffering, who is completely  disinterested in the attainment of happiness,  and whose attachment, fear, and anger have  been destroyed, is said to possess a steady mind.  A man who is devoid of all affection and neither  rejoices nor hates the receipt of any good or bad ...

DAY-54

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स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।  स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् । ५४। श्रीभगवानुवाच  प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ  मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। ५५। हिंदी अर्थ अर्जुन बोले- हे केशव ! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त  हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे  बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? श्रीभगवान् बोले- हे  अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को  भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस  काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है ॥ ५४-५५ ॥

DAY-53

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यदा  ते  मोहकलिलं  बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।  तदा  गन्तासि  निर्वेदं  श्रोतव्यस्य  श्रुतस्य  च। ५२ ।  श्रुतिविप्रतिपन्ना  ते  यदा  स्थास्यति  निश्चला।  समाधावचला  बुद्धिस्तदा  योगमवाप्स्यसि । ५३ । हिंदी अर्थ -जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल  को भलीभाँति पार कर जायगी, उस समय तू सुने हुए  और सुनने में आने वाले इस लोक और  परलोकसम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो  जायगा। भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित  हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर  जायगी, तब तू योग को प्राप्त हो जायगा अर्थात् तेरा  परमात्मा से नित्य संयोग हो जायगा ॥ ५२-५३ ॥

DAY-51

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योगस्थः  कुरु  कर्माणि  सङ्गं त्यक्त्वा  धनञ्जय।  सिद्धयसिद्धयोः  समो  भूत्वा  समत्वं  योग  उच्यते।४८।  दूरेण  ह्यवरं  कर्म  बुद्धियोगाद्धनञ्जय।  बुद्धौ  शरणमन्विच्छ  कृपणाः  फलहेतवः ।४९। हिंदी अर्थ-हे धनंजय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्यकर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है।  इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिये हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षाका उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल के हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं ॥ ४८-४९ ॥

DAY-50

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यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः । ४६ ।  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि । ४७। हिंदी अर्थ -सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्मको तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है। तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ॥ ४६-४७ ॥

DAY-49

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भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते। ४४। त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्। ४५ । हिंदी अर्थ-उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं; उन पुरुषोंकी परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करनेवाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग-क्षेम को न चाहनेवाला और स्वाधीन अन्तःकरणवाला हो ॥ ४४-४५ ॥

DAY-48

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यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः। ४२। कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति। ४३। हिंदी अर्थ -हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्गसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है-ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं जो कि जन्मरूप कर्मफल देनेवाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करनेवाली है ॥ ४२-४३ ॥

DAY-47

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नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् । ४० । व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्। ४१ । हिंदी अर्थ -इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीजका नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है। हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं ॥ ४०-४१ ॥

DAY-46

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सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि । ३८। एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध‌या युक्तो वया पार्थ कर्मवन्धं प्रहास्यसि । ३९ । हिंदी अर्थ -जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर, उसके बाद युद्धके लिये तैयार हो जा; इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा। हे पार्थ। यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोगके विषयमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन - जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मोंके बन्धनको भलीभाँति त्याग देगा अर्थात् सर्वथा नष्ट कर डालेगा ॥ ३८-३९ ॥

DAY-45

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अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् । ३६ । हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः। ३७। हिंदी अर्थ -तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे; उससे अधिक दुःख और क्या होगा? या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो जा ॥ ३६-३७॥

DAY-44

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अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । ३४।  भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् । ३५। हिंदी अर्थ-तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्तिका भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुताको प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भयके कारण युद्धसे हटा हुआ मानेंगे ॥ ३४-३५॥