DAY-59
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति। ६४। प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते। ६५ । हिंदी अर्थ-परंतु अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला साधक अपने वश में की हुई राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है ॥६४-६५ ॥ English Meaning - But a devotee with his conscience subdued, moving through objects with his senses devoid of attachment and aversion, attains inner contentment. With the inner contentment, all its sorrows vanish, and the mind of that happy Karmayogi quickly turns away from everything else and becomes firmly fixed on the one Supreme Soul. 64-65.